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जैसा कि योगेश्वर  भगवान श्री कृष्ण कहते हैं- मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम अर्थात् भौतिक प्रकृति मेरी अध्यक्षता में कार्य करती है। जिस तरह से सोने का कण भी सोना ही होता हैं, शेर के बच्चे में शिकार की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती हैं। पानी से मछली को सर्दी – जुकाम नहीं होता तथा जहर से सांप को डर नहीं लगता, ठीक उसी तरह हम सभी में परमात्मा का ही अंश है। हम अति सूक्ष्म मात्रा में परमेश्वर के गुणों से युक्त हैं, इसीलिए हम प्रकृति पर विभिन अविष्कारों के माध्यम से नियन्त्रण का प्रयास कर रहे हैं, और इस समय हम अन्तरिक्ष और ग्रहों को वश में रखना चाहते हैं। हममें नियन्त्रण की यह प्रवृत्ति इसलिए है क्योंकि हम उसी आदि अजन्मे, नित्य तथा अविनाशी परमात्मा का सूक्ष्म अंश हैं जो समस्त पृथ्वी, आकाश, पाताल, ग्रह, नक्षत्र तथा संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने संकल्प मात्र से नियन्त्रित कर रहा है। विज्ञान हमें अनिश्वरवादी नहीं बनाता है। हमारा कुछ तकनीकी ज्ञान या सीमित मात्रा में प्रकृति पर नियन्त्रण हमारी भौतिक बुद्धि को मंद बना देता हैं

यदि साथ में धर्म व संस्कृति की सत्य रूपी खुराक न दी गई तो हमारा अभिमान /अहंकार ईश्वर की सत्ता को ही चुनौती देने लगता है एवं फिर भी  ईश्वर उसको गंभीरता से नहीं लेता। ठीक उसी तरह से जिस तरह से समुद्र की एक बूंद छलक जाने से समुद्र बेैचेन नहीं होता क्योंकि ईश्वर ही अंततः समस्त ज्ञान का स्रोत हैं, एवं ज्ञान के स्रोतों का भी परम स्रोत हैं, तथा विज्ञानों का भी  परम विज्ञान है। जैसे-जेैसे हमारे मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा व सनातन वैदिक धर्म के प्रति आचरण की प्रवृत्ति उभरती है हमारे भीतर प्रकाश का उदय होता है ईश्वर को हम अपनी कल्पना के हिसाब से ढालने की बजाय उसके वास्तविक स्वरूप को भक्तिभाव से समझें व प्रकृति  पर भौतिक नियन्त्रण की साधना में भी लगे रहें, किन्तु ध्यान रहे आधुनिक कंप्यूटर  तकनिकी भाषा में व्यक्त करें तो हार्डवेयर उन्नत करने कि दौड़ में साॅफ्टवेयर से न पिछड़ जाए, उसे अनदेखा मत  कर देना वरना ज्ञान की यह घमण्डी यात्रा प्रकृति के हाथों ही मानव का विनाश करवा देगी। इम अपने कर्म के फल को बदल भी सकते हैं। यह हमारे ज्ञान की पूर्णता पर निर्भर करता  है। वैदिक ज्ञान  मनुष्यों के लिए है, पशुओं के लिए नहीं, जो पशुगत मूढ़ बुद्धि व अभिमान के साथ वेदों का अध्ययन पूर्वाग्रह के साथ अपनी मान्यताओं के संदर्भ को तोड़ने मरोड़ने के लिए करता है वह वास्तव में मानव रूपी शरीर में पशु ही है। पशुओं की आवश्यकता उदरपूर्ति व शरीर का पोषण करना मात्र है। मस्तिष्क ज्ञान इत्यादि से भला उनका क्या सरोकार हो सकता है ?

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अंग्रेजी का ’रिलीजन’ शब्द सनातन धर्म से थोड़ा भिन्न  है। रिलीजन’ से विश्वास का भाव सूचित होता है और विश्वास परिवर्तित हो सकता है। किसी को एक विशेष विधि में विश्वास हो सकता है और वह इस विश्वास को बदलकर दूसरा ग्रहण कर सकता है, लेकिन सनातन धर्म उस कर्म का सूचक हें जो बदला नहीं जा सकता। उदाहरनार्थ न तो जल से उसकी तरलता अलग की जा सकती है और न ही अग्नी से उष्मा को, जो सनातन धर्म को छोड़ने की सोचना है वह ठीक उसी तरह का असफल प्रयास है।

यह दृश्य जगत जिस में हम रह रहे है वह सत्य में पूर्ण है। क्योंकि जिन 24 तत्वों से यह नश्वर ब्रह्माण्ड निर्मित है वे सांख्य दर्शन के अनुसार इस ब्रह्माण्ड के पालन तथा धारण के लिये अपेक्षित संसाधनों से पूर्णतः समन्वित है। इसमें न तो कोई विज्ञातीय तत्व है और न ही किसी वस्तु की आवश्यकता है। इस सृष्टी का अपना एक नियत ताल है जिसका निर्धारण आदि और अनन्त ज्ञान के स्रोतों  वेदो में उल्लेखित होकर परमेश्वर द्वारा नियत है। सारा वैदिक ज्ञान अमोघ (अच्च्युत) है और दुनिया भर के हिन्दु इसे अमोघ अन्तिम मानते है। जैसा कि आजकल प्रवृत्ति चल पड़ी है  जिस किसी ने अंग्रेजी के 26 अक्षरों का ज्ञान प्राप्त कर लिया वह अपने तरीके से वैदिक ज्ञान का शोध करने चल पड़ता है। वैदिक ज्ञान शोध का विषय नहीं है। यह ईश्वर द्वारा किया गया शोध कार्य है जिसे मानवीय संसाधनों से सत्यापित नहीं किया जा सकता । हमारा शौध कार्य अपूर्ण है, क्योंकि हम अपूर्ण इन्द्रियों द्वारा शोध कार्य करते है। यदि एक ही विषय को विभिन्न व्यक्तियों को समझने के लिए दिया जाय तो सब के द्वारा विषय विशेष के बारे में निष्कर्ष   एवं समझ भिन्न-भिन्न हो सकती है। इस प्रकार मानव मस्तिष्क की दुर्बलताओं से उत्पन्न निष्कर्ष ईश्वरीय ज्ञान के विषय में भ्रमित करने वाले हो सकते हैं। यही कारण है कि विज्ञान जितना परिष्कृत होता जा रहा है, सनातन वैदिक हिन्दु धर्म के अकाट्य, अखण्डनीय स्रोत  वेद उतने ही सत्य प्रमाणित होते जा रहे है। यह हमारे ज्ञान का उथलापन ही है की हम ईश्वरीय निष्कर्ष वेदों  को समझने में कालक्रम से अनभिज्ञ हैं वैद तो सर्वकालिक वहीं यथा रूप है। सांसारिक मनुष्य में कई दोष होते है। वह त्रुटियाँ करता है, भ्रमित होता है, धोखा देता है एवं अपने सीमित ईन्द्रीय ज्ञान से आरक्षित होता है। मनुष्य में इन  दोषों के निवारण के लिए ही ईश्वर ने अद्भुत ज्ञान के स्रोत  वेदों को मानव जाति के कल्याण के लिये प्रकट किया है।

ईश्वर द्वारा उत्पन्न वैदिक ज्ञान एवं मनुष्य द्वारा उत्पन्न शंका, भ्रम, हीन भावना, द्धेष एवं दुर्बलता के कारण ईश्वरीय स्रोतों  से मनुष्य की दूरी बढ़ती जा रही हेै। ऋषि पुत्र एवं देवी पुत्र (श्री पुत्र) अपने आपको हीन, उपेक्षित एवं लाचार समझने लगे हैं यह एक अत्यन्त खतरनाक प्रवृति है। इसे दूर किया जाना नितान्त आवश्यक है। हम दुनिया के सामने यह साबित करना चाहते है कि भारत पूर्व में भी विश्व गुरू रह चुका है एवं आगे भी दुनिया भारत से इसी जिम्मेदारी को निभाने के लिये अनुरोध करेगी क्योंकि भारतीय संस्कृति का प्राण सनातन वैदिक  धर्म है। हम यह सिद्ध करना चाहते है कि पृथ्वी के निवासियों, धर्मो की माता सनातन  धर्म ने अपनी जिम्मेदारी को निभाने के लिये सदैव पहल की है। आधुनिक हिन्दू नवयुवकों के मस्तिष्क में तथाकथित सेक्यूलर मीडिया द्वारा उत्पन्न मनोवैज्ञानिक हताशा को समाप्त कर के नवीन गौरव, स्फूर्ति, एवं नवजीवन का संचार करने के लिए हम  वचनबद्ध है। हम मनुष्य (जीवात्मा) और परमात्मा की दूरी समाप्त करके उसे पुनः ईश्वरीय नाम एवं कम्र से सम्बोधन  के इच्छुक है। भाइयों और बहिनों ! सनातन धर्म  ऐसा धर्म है जिस में विश्व में उपजी हर समस्या का पूर्व से ही उल्लेख एवं समाधान है।

हिन्दु धर्म एवं संस्कृति के प्रतीकों का संरक्षण करने, हताश हिन्दुओं में नवजीवन का संचार करने, उन्हें उनका गौरव मय अतीत का स्मरण कराने, वैदिक ज्ञान केा विश्व के समक्ष पुनः स्थापित करने, हिन्दुओं में बिखराव को समाप्त करने एवं बिखरी हुई हिन्दु रूपी प्रकाश किरणों को एकत्रित कर सम्पूर्ण विश्व को सनातन धर्म के प्रकाश से आलोकित करने के लिए हमें आपका सम्बल, आशीर्वाद एवं तन मन धन से सहयोग की आवश्यकता है।

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आज आवश्यकता है कि हम बिखरी हुई हिन्दू चेतना को एक सूत्र में बाँधें और सनातन धर्म के दिव्य प्रकाश से सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करें। इस महायज्ञ में आपकी सहभागिता अनिवार्य है—आइए, अपने आशीर्वाद, सहयोग और तन-मन-धन से इस पुण्य कार्य का सशक्त आधार बनें।”
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